आबकारी पोर्टल में किसने मारी सेंध? निलंबित लाइसेंस की फीस 11और 17 मार्च को कैसे हुई जमा, सिस्टम पर बड़े बड़ा सवाल दो महीने से निलंबित लाइसेंस, हाईकोर्ट में मामला लंबित; फिर पोर्टल खुला कैसे और OTP किसके मोबाइल पर गया?
आबकारी पोर्टल में किसने मारी सेंध? निलंबित लाइसेंस की फीस 11और 17 मार्च को कैसे हुई जमा, सिस्टम पर बड़े
बड़ा सवाल दो महीने से निलंबित लाइसेंस, हाईकोर्ट में मामला लंबित; फिर पोर्टल खुला कैसे और OTP किसके मोबाइल पर गया?
✍️ पंकज सिंह भदौरिया
भोपाल | मध्य प्रदेश आबकारी विभाग के डिजिटल सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। 11और 17 मार्च को सोम कंपनी द्वारा कथित रूप से खुले पोर्टल पर लाइसेंस फीस जमा किए जाने की घटना ने विभागीय कार्यप्रणाली, आईटी सुरक्षा और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका को कटघरे में ला दिया है।
हाईकोर्ट ने 23 मार्च को निलंबन को वैध माना था,
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब संबंधित लाइसेंस लगभग दो महीने से निलंबित है और मामला उच्च न्यायालय में लंबित है, तब पोर्टल आखिर खुला कैसे? हाईकोर्ट ने 23 मार्च को निलंबन को वैध माना था, जबकि कंपनी ने 11और 17 मार्च की अपनी सार्वजनिक सूचना में भी “स्टेटस में कोई बदलाव नहीं” कहा था।
मामले में कई गंभीर तकनीकी और कानूनी प्रश्न उठ रहे हैं—
क्या पोर्टल किसी अधिकृत अधिकारी ने खोला?
क्या इसके लिए OTP आधारित ऑथेंटिकेशन का उपयोग हुआ?
यदि हुआ, तो OTP किस मोबाइल नंबर पर भेजा गया?
क्या यह विभागीय स्तर पर मिलीभगत का मामला है?
क्या लंबित न्यायिक प्रक्रिया के बावजूद फीस स्वीकार करना न्यायालय की भावना की अवहेलना माना जाएगा?
सूत्रों के अनुसार, विभागीय पोर्टल पर किसी निलंबित या निष्क्रिय लाइसेंस के लिए फीस भुगतान की सुविधा सामान्यतः स्वतः उपलब्ध नहीं रहती। ऐसे में 11और 17 मार्च को फीस जमा होना सिस्टम एक्सेस, यूज़र परमिशन और बैकएंड ऑथराइजेशन पर गंभीर शंका पैदा करता है। यदि जांच में यह सामने आता है कि किसी अधिकारी या तकनीकी कर्मचारी ने जानबूझकर पोर्टल सक्रिय कराया, तो यह केवल विभागीय लापरवाही नहीं बल्कि आईटी सिस्टम के दुरुपयोग, सरकारी रिकॉर्ड में हस्तक्षेप और न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने की साजिश जैसे गंभीर आरोपों का विषय बन सकता है।
कानून की नजर में जिम्मेदार दोषी
कानूनी जानकारों का मानना है कि यदि लाइसेंस निलंबन प्रभावी रहते हुए फीस स्वीकार की गई है, तो जिम्मेदार
अधिकारियों पर एफआईआर, विभागीय जांच और आईटी एक्ट सहित आपराधिक धाराओं में कार्रवाई संभव है। हालांकि अंतिम निष्कर्ष जांच एजेंसियों की रिपोर्ट पर निर्भर करेगा।
विभाग स्वयं एफआईआर दर्ज कराता है या मामला किसी स्वतंत्र जांच एजेंसी को सौंपा जाता है
अब निगाहें इस बात पर हैं कि आबकारी विभाग स्वयं एफआईआर दर्ज कराता है या मामला किसी स्वतंत्र जांच एजेंसी को सौंपा जाता है। क्योंकि सवाल सिर्फ फीस जमा होने का नहीं, बल्कि सरकारी पोर्टल की विश्वसनीयता और प्रशासनिक जवाबदेही का है
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