बैंक गारंटी के बदले रिश्वत मांगने का आरोप, छिंदवाड़ा में आबकारी विभाग पर गंभीर सवाल
“₹ 2 लाख बड़े साहब को और ₹50 हजार बाबू को दो, तभी मिलेगी गारंटी”
पंकज सिंह भदौरिया
छिंदवाड़ा/भोपाल कंपोजिट मदिरा दुकान समूह चांदामेटा के लाइसेंसी मुकेश शिवहरे ने जिला आबकारी विभाग पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि वर्ष 2025-26 की पूरी लाइसेंस फीस जमा करने के बावजूद उनकी बैंक गारंटी वापस नहीं की जा रही है।
रिश्वत मांगने का आरोप
मुकेश शिवहरे ने आरोप लगाया है कि जिला आबकारी कार्यालय के ठेका बाबू मनीष ने बैंक गारंटी वापस करने के बदले ₹2 लाख “बड़े साहब” के नाम पर और ₹50 हजार स्वयं के लिए मांगे। कथित तौर पर उन्हें यह भी धमकी दी गई कि “देखते हैं अगले 10 दिन तुम दुकान कैसे चलाते हो।”
अधिकारियों से नहीं हुई सुनवाई*
शिवहरे के अनुसार, उन्होंने कई बार जिला आबकारी अधिकारी से मिलने की कोशिश की, लेकिन उन्हें समय नहीं मिला। फोन पर संपर्क करने का प्रयास भी सफल नहीं रहा।
नए ठेके पर खतरा, राजस्व हानि की आशंका
शिकायतकर्ता ने बताया कि उन्होंने जिला रायसेन के गोहरगंज कंपोजिट शराब दुकान समूह का ठेका सबसे ऊंची बोली के साथ लिया है। इसके लिए समय पर बैंक गारंटी जमा करना अनिवार्य है। यदि गारंटी समय पर नहीं मिलती, तो उनका नया ठेका निरस्त हो सकता है, जिससे सरकार को राजस्व का नुकसान हो सकता है।

भीमराव वैद्य जिला आबकारी अधिकारी छिंदवाड़ा
“ छोटा लाइसेंसी हूं, नए ठेके की उम्मीद”
मुकेश शिवहरे ने कहा कि वह एक छोटे लाइसेंसी हैं और बैंक गारंटी की राशि वापस मिलने पर ही नए ठेके में भाग ले सकते हैं।
उच्च स्तर पर पहुंची शिकायत
इस मामले की शिकायत प्रमुख सचिव वाणिज्य कर विभाग, आबकारी आयुक्त ग्वालियर और आबकारी मंत्री, मध्य प्रदेश को भी भेजी गई है।
कार्रवाई की मांग
शिवहरे ने मांग की है कि उनकी बैंक गारंटी तत्काल वापस कराई जाए और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों पर सख्त कार्रवाई की जाए।

पॉलिसी और सिस्टम पर उठे सवाल
आबकारी विभाग में कथित भ्रष्टाचार के इस मामले ने प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
वहीं, प्रदेश की आर्थिक स्थिति और वर्ष 2026-27 की आबकारी नीति के तहत होने वाले टेंडरों के बीच इस तरह के आरोप विभाग की कार्यप्रणाली को और चुनौतीपूर्ण बना सकते हैं। छिंदवाड़ा में सामने आए इस मामले ने यह संकेत दिया है कि यदि आरोपों की निष्पक्ष जांच नहीं हुई, तो इसका असर न केवल लाइसेंसियों पर बल्कि सरकार के राजस्व और आगामी आबकारी टेंडरों की पारदर्शिता पर भी पड़ सकता है।
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