मुगल शासन में दिखे कई बदलावों से कथक लचीला हो गया: शमा भाटे
नई दिल्ली। प्रसिद्ध कथक नृत्यांगना, गुरु और कोरियोग्राफर शमा भाटे के बारे और उनके जीवन, कला यात्रा और कथक के प्रति उनके दृष्टिकोण को दिखाती है। शमा भाटे पुणे में रहती हैं। वे विख्यात कथक नृत्यांगना रोहिणी भाटे की शिष्या और बहू हैं। उन्होंने महाराष्ट्र में उत्तर भारतीय कथक के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 6 अक्टूबर 1950 को जन्मीं शमा भाटे ने 7 साल की उम्र में कथक सीखना शुरू किया और रोहिणी भाटे की प्रेरणा से जीवन का उद्देश्य बनाया। वह रोहिणी भाटे को अपनी आदर्श मानती हैं।
हाल ही में, उनके 75 वर्ष पूरे होने पर भव्य अमृतोत्सव आयोजित किया गया। इस समारोह में उन्हें पंडित दीनानाथ मंगेशकर अवॉर्ड देने की घोषणा भी हुई। उनकी मराठी पुस्तक नृत्यमय जग.. नर्तनाचा धर्म.. भी इन्हीं दिनों आई है। शामा का कथक के प्रति उनके लगाव पर वे कहती हैं कि कथक को कभी न समाप्त होने वाला सागर मानती हैं। उनका मानना है कि सभी बड़े कलाकारों ने परंपरा को एक प्रवाह के रूप में ही माना है, और इसमें कलाकार को अपना कोना मिलना चाहिए। उन्होंने कई तालों, बंदिशों, और तरानों का प्रयोग किया जो उन्होंने सीखा नहीं था, जिसमें रातंजनकर जी की, अभिषेकी जी की, जसराज जी की बंदिशें शामिल हैं।
उनका मानना है कि ये चीजें भले ही कथक में न आई हों, लेकिन संगीत के व्यापक दायरे में शामिल हैं।
उन्होंने विश्व संगीत के साथ कम से कम 65 कार्यक्रम किए और महसूस किया कि संगीत की भाषा सार्वभौमिक है। वह मानती हैं कि कथक का दायरा बहुत बड़ा है और इस दायरे को सीमित नहीं करना चाहिए।
उनके अनुसार, कथक कई दौर से गुजरा है, और मुगल शासन में दिखाई गए कई बदलावों से गुजर कर कथक लचीला हो गया।
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