नई दिल्ली । कितना पानी चोरी हो रहा है, रिसाव में बर्बाद हो रहा है, इस पर किसी का ध्यान नहीं है। अनधिकृत कॉलोनियों में कैसे पानी की आपूर्ति हो रही है इससे भी किसी का सरोकार नहीं है। अभी तो सारा जोर वन टाइम सेटलमेंट पर है। कहानी जहां से 2013 में शुरू हुई थी, घूम फिरकर वहीं आती दिख रही है। उस समय भी दिल्ली की आम आदमी पार्टी पानी के बिल, हवा से तेज भागते मीटर के मुद्दे के साथ मैदान में उतरी थी और अब एक बार फिर से लगातार बजट सत्र के नाम पर बीते 12 दिन से सदन में इसे ही लागू करने का विवाद गर्माया हुआ है। ऐसे में सवाल ये उठता है कि पानी के नए मीटरों के कारण यदि बिल बढ़े आ रहे हैं तो मीटर क्यों नहीं बदले जा रहे? जल बोर्ड में निजीकरण की एंट्री हुई थी तो उस काम में परफेक्शन क्यों नहीं हुआ? उसमें घपले क्यों उजागर हो गए? आखिर मीटर बदलने में कहां बाधा है? साथ ही, वर्तमान में सभी पहलुओं को देखते हुए इस मुद्दे का क्या है समाधान? कैसे दी जाए दिल्लीवासियों को इस परेशानी से राहत? इसी की पड़ताल करना हमारा आज का मुद्दा है। दिल्ली वर्तमान में पानी के बिलों की वन टाइम सेटलमेंट (ओटीएस) स्कीम को लेकर राजनीतिक जंग छिड़ी हुई है। आप सरकार का कहना है कि ओटीएस को एलजी की ओर से अनुमति नहीं मिल रही, वहीं भाजपा का कहना है कि बढ़े हुए बिल जल बोर्ड के नए मीटरों के कारण आ रहे हैं। दिल्ली सरकार का दावा है कि उसने लोगों का पानी मुफ्त कर रखा है तो ओटीएस स्कीम लाने के बजाय उसे सारे बिल शून्य घोषित कर देने चाहिए।